ई-वे बिल पर लगाई 6.82 लाख की पेनाल्टी वापस करने के निर्देश
जबलपुर। जीएसटी की देनदारी और व्यापार में इसकी विसंगतियों के कारण परेशान कारोबारियों के लिए एमपी हाईकोर्ट का एक फैसला राहत भरा रहा। दरअसल,ई-वे बिल को लेकर व्यापारियों पर मनमानी पेनाल्टी थोपने वाले अधिकारियों का भूत कोर्ट के इस निर्णय से उतर गया, जिसकी व्यापार जगत में खासी प्रतिक्रिया है। हाईकोर्ट जस्टिस सुजय पॉल व जस्टिस प्रकाश चंद गुप्ता की डबल बेंच ने लोहा कारोबारी के ई-वे बिल पर काटी गई 6 लाख 82 हजार रूपए की पेनाल्टी को 30 दिन के अंदर वापस करने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में ये भी कहा है कि यदि 30 दिन के अंदर यह पेनाल्टी वापस नहीं की गई तो विभाग को 6 प्रतिशत के हिसाब से व्यापारी को ब्याज भी देना होगा।
अधिकारियों ने नहीं सुनी फरियाद और न देखे कागजात
. विगत 18 मई 2022 को रायपुर से एक ट्रक सरिया (टीएमटी बार) लेकर डिंडोरी पहुंचा था, लेकिन ज्ञात कारणवश सरिया लदा ट्रक 4 घंटे लेट हो गया था। याचिकाकर्ता के वकील टैक्सेशन एक्सपर्ट अभिषेक ध्यानी ने कोर्ट को बताया कि जीएसटी अधिकारियों ने व्यापारी पर 6 लाख 82 हजार रूपए की पेनाल्टी यह कहते हुए लगा दी थी कि ई-वे बिल 4 घंटे पहले एक्सपायर हो चुका है, इसलिए नियम अनुसार पेनाल्टी देना पड़ेगी। जबकि व्यापारी दयाशंकर सिंह ने अधिकारियों को तर्क के साथ ट्रक लेट होने की बात बताई और ट्रक की तकनीकि खराबी सुधारने के कागजात भी दिखाए, लेकिन अधिकारियों ने उसकी सुनवाई नहीं की और 6 लाख 82 हजार रूपए की पेनाल्टी भरने का आदेश दे दिया। जीएसटी अधिकारियों के इस रवैये के खिलाफ व्यापारी ने हाईकोर्ट में याचिका पेश की थी। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सुनवाई करते हुए आदेश दिया कि व्यापारी को 30 दिन के भीतर 6 लाख 82 हजार रुपए पेनाल्टी वापस की जाए और ऐसा न करने पर 6 प्रतिशत ब्याज दिया जाए। उल्लेखनीय है कि यह सरिया डिंडोरी में निर्माणाधीन बच्चों की स्कूल के लिए मंगाया गया था।
जबलपुर चेम्बर ने कहा- निर्णय राहत देने के साथ अंकुश लगाएगा
जीएसटी की विसंगतियों से जूझ रहे व्यापारियों के लिए हाईकोर्ट के इस निर्णय पर जबलपुर चेम्बर ऑफ कामर्स के सचिव हिमांशु खरे ने कहा कि कोर्ट का यह निर्णय न केवल राहत भरा है बल्कि इससे जीएसटी अधिकारियों की मनमानी पर अंकुश लगेगा। इससे अन्य विभाग भी सबक लेंगे। याचिकाकर्ता के वकील अभिषेक ध्यानी ने कहा कि हाईकोर्ट का यह निर्णय ऐतिहासिक है और इससे यह भी प्रतिपादित होता है कि छोटी-छोटी त्रुटियों के लिए शास्ती आरोपित नहीं करना चाहिए, वरना व्यापारियों के बीच जीएसटी पूर्ण रूप से स्थापित नहीं हो सकेगा।
