इस जीत-हार के एक नहीं कई कारण,दोनों दलों में मंथन
जबलपुर। 1998 में मेयर पद पद कांग्रेस के विश्वनाथ दुबे की जीत के बाद शहर के चुनावी इतिहास का संभवत: ये पहला चुनाव परिणाम है, जिसमें हार का जश्न, जीत के जश्न पे भारी है। मेयर पद गवां चुकी भाजपा ऊपरी तौर पर शांत है, लेकिन इस शांति के चेहरे पर उसके भीतर की खुशनुमा स्थिति छिपाये नहीं छुप रही है। भाजपा का एक भी नेता इस हार को अप्रत्याशित नहीं मान रहा है। मौजूदा-पूर्व और भूतपूर्व जनप्रतिनिधि, नेता, पदाधिकारी सब इस हार के लिए जैसे तैयार बैठे थे। बीते एक पखवारे के सियासी परिदृश्य पर हल्की सी भी दृष्टिपात करने पर ये स्पष्ट समझ आ जाता है कि भाजपा मानो इस पराजय का माहौल बना रही थी। दूसरी तरफ जिस जीत पर कांग्रेसी इतरा रहे हैं, उसे कांग्रेस की बजाय प्रत्याशी की जीत माना जा रहा है। ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है कि कांग्रेस प्रत्याशी को पार्टी की बजाय निज रणनीति के चलते से ये सफलता हासिल हुई है।
मेयर को जिता कर भाजपा को वार्डो में जिताया
परिणाम प्रभावित करा देने की कोशिश में लगे रहने वाले भले खुश हों, लेकिन आम शहरी भाजपा की हार से आश्चर्यचकित भी है। शहरवासियों ने कांग्रेस को पूरे शहर में तबियत से हराया है, वहीं भाजपा को गोद भर-भर के वोट दिए हैं। ऐसे में 44 हजार की हार इसलिए खल रही है, क्योंकि भाजपा जैसी बड़े जनाधार वाली पार्टी के लिए 50-60 हजार वोट कबाड़ना कोई बड़ी बात नहीं थी। वहीं कांग्रेस की जीत के अपने कारण है। जिस प्रत्याशी को टिकट का भरोसा दिया गया, टिकट उसे ही मिली। इस दौरान प्रत्याशी का निजी श्रम, अपनी तैयारी, निर्विवाद छवि, जनता से सीधा संवाद, मुद्दों की समझ, शानदार वायदे और प्रभावी रणनीति ने उनकी जीत की जमीन तैयार की। जिस तरह भाजपा की हार के कई कारण हैं, इसी तरह कांग्रेस की जीत के भी कई कारण हैं।
