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सरोकार की पत्रकारिता गई तेल लेने-पत्रकार तेल बेचने लगे, प्रख्यात जर्नलिस्ट संजय सिन्हा से जानिए पत्रकारिता की हकीकत

यस सर, यस सर......

भरोसे की खबर की जगह कमाल की खबरों का चलन

 जितने दिनों तक मैं जनसत्ता अखबार में काम करता रहा मुङो कभी पता ही नहीं चला कि अखबार का सर्कुलेशन कितना है, रेवेन्यू कितना है। बात सिर्फ मेरी नहीं, हम में से किसी को नहीं पता होता था कि अखबार कितना बिकता है। वो तो एक बार प्रभाष जोशी ने संपादकीय में लिख दिया था कि पाठक माई-बाप, अब मिल बांट कर अखबार पढ़ें क्योंकि मशीन की जितनी क्षमता है, उससे कुछ अधिक ही अखबार छप रहा है, अब इससे अधिक अखबार हम नहीं छाप सकते। तब पता चला था कि शायद जनसत्ता रोज करीब दो-ढाई लाख प्रति छप रहा था। 

   अब आप कह सकते हैं कि संजय सिन्हा आखिर अखबार के सर्कुलेशन की कथा लेकर क्यों चले आए हैं? बात ये है कि अखबार में हमारा काम होता था सही खबरों को छापना। हमारी योग्यता थी अखबार की भाषा। हम किस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं, हम किस तरह खबरों को रोचक अंदाज़ में लिखते हैं और किस तरह उसकी विश्वसनीयता बनाए रखते हैं। अखबार कितना बिकता है, कहां बिकता है ये हमारा सरदर्द नहीं था। इसके लिए सर्कुलेशन के लोग होते थे। कितना विज्ञापन आता है ये भी हमारे सोचने का विषय नहीं था। हमने अपना काम किया, हमें सैलरी मिली। समाज में इज्जत मिली। बस। जब मैं अखबार से टीवी की दुनिया में आया तो पहली बार पता चला कि यहां टीआरपी जैसी कोई चीज़ होती है, जिसे ठीक से समझने पर पता चला कि वो सर्कुलेशन जैसा ही कोई मसला था और उसकी ज़िम्मेदारी भी हमारे ऊपर ही थी। मतलब हम कुछ ऐसा करें कि हर घर में बस वही चैनल देखा जाए। वहीं से शुरुआत हुई भरोसे की खबरों की जगह कमाल की खबरें परोसने की।

 संपादक नामक संस्था पर मैनेजर का बढ़ा बोलबाला

 सांप-छूछूंदर का खेल तो बाद में आया, पहले तो ये दबाव आया कि हर रिपोर्टर को रोज दो एक्सक्लुसिव खबरें करनी हैं। कहां से लाएगा खबर? खबर होगी तभी तो खबर लिखेंगे? संपादक नामक संस्था पर अचानक मैनेजर नामक संस्था का बोलबाला बढ़ने लगा। मैनेजर संपादकों और रिपोर्टर की मीटिंग लेने लगे थे। मुङो याद है ज़ी न्यूज़ में एक चीफ मैनेजर थे, जो इंडियन एक्सप्रेस से ही वहां आए थे, उन्होंने शर्त रख दी थी कि हर रिपोर्टर रोज कम से कम दो खबर एक्सक्लुसिव देगा। उनका कहना था कि प्रेस कांफ्रेंस की खबर की गिनती नहीं होगी। वो तो बनी-बनाई खबर है। आप तो अपनी खबर लाएं। रिपोर्टर बाप-बाप करने लगे थे। सरोकार की पत्रकारिता गई तेल लेने। पत्रकार तेल बेचने लगे।

 सोनिया ने इस्तीफा वापस लेते समय चंदेरी की साड़ी पहनी

अब खबरें नहीं थीं तो भी हम खबर क्रिएट करने लगे। मैंने खबर बनाई कि बिहार के लड़कों में मिल्की व्हाइट लड़की से शादी करने का क्रेज है। एक खबर बनी कि बिहार में फलां जगह एक आदमी चलता-फिरता ब्लड बैंक है। कहीं भूकंप आया तो खबर बनी कि ये दिल्ली में आता तो दिल्ली खत्म हो जाती। सोनिया गांधी ने अध्यक्ष पद से दिया इस्तीफा वापस लिया, तो वो खबर प्रेस कांफ्रेंस की हो गई। मैंने खबर बनाई कि सोनिया गांधी ने ताल कटोरा स्टेडियम में इस्तीफा वापस लेने के लिए आयोजित समारोह में चंदेरी की साड़ी पहनी थी। चंदेरी में शानदार साड़ियां बनती हैं।

 दिल्ली में लोग लड़कियों को ताड़ते हैं

रोचक, विचित्र किंतु सत्य और असत्य जैसी खबरें चलने लगीं। असली खबर खोने लगी। ऊट-पटांग किस्म के खुलासे होने लगे। एक तो बहुत ही दिलचस्प वाकया हुआ था। रिपोर्टर को स्टिंग ऑपरेशन करना था तो वो कनाट प्लेस गया, वहां अपने साथ एक महिला रिपोर्टर को ले गया। आधुनिक कपड़ों में रिपोर्टर बाज़ार में घूमती रही और जो लोग उसकी ओर देख रहे थे, उनका वीडियो बनाया जाने लगा। सबकी आंखें बहुत क्लोज में कैद की गईं और खबर बनी कि दिल्ली में लोग लड़कियों को ताड़ते हैं। हा हा हा। क्या खबर थी। दर्शक मजेदार खबरों पर लहालोट हुए जा रहे थे, हम बिना काम किए कुछ भी अंड-बंड परोस कर मस्त हो रहे थे।

 नेता खबरें न दिखाने से खुश, धकाधक विज्ञापन आ रहे

उन्हीं दिनों एक ऐसा चैनल बाजार में उगा, जिसके पास न तो लाइव दिखलाने के लिए ओबी वैन का जुगाड़ था, न बढ़िया रिपोर्टर या एंकर। दुकान सज गई थी। अब चैनल खुला है तो चलाना भी पड़ेगा। तो शुरू हुआ काल्पनिक संसार का दौर। आसमान में साईं बाबा की तस्वीर दिखने का दौर। एलियन के हाथों गाय को उड़ा ले जाने का दौर। नाग-नागिन का दौर। नेता लोग खुश थे कि अच्छा है रिपोर्टर मस्तराम की खबरें दिखला रहे हैं। रिपोर्टर खुश थे कि मस्ती की नौकरी चल रही है। मालिक खुश थे कि नेता खबरें नहीं दिखाने से खुश हैं और विज्ञापन धकाधक आ रहा है।

 टीआरपी और विज्ञापन भारी पड़ने लगे खबरों पर

हर बैंड के नए प्रोड्यूसर बनाए जाने लगे। सभी को ठेका दिया जाने लगा कि आपके बैंड की टीआरपी से आपके प्रमोशन की टीआरपी जु़ड़ी है। जिस ह़फ्ते जिसके अलबलाए शो की टीआरपी आ जाती वो चौड़ा होकर घूमता। गोया कि वही सबसे काबिल पत्रकार है। असली पत्रकारिता खोने लगी। श्याम बेनेगल घर बैठ गए। संजय लीला भंसाली की तरह बिना कहानी, बिना निर्देशन के महंगे सेट वाली फिल्म का दौर शुरू हो गया। रीयल की जगह वर्चुअल सेट का बोलबाला हो गया। छोटे-छोटे पत्रकारों को टीआरपी का खेल सिखाया जाने लगा। टीआरपी, विज्ञापन खबर पर भारी पड़ने लगे।

पढ़े-लिखे संपादक घास छीलने लगे, मदारी संपादक मालिकों को भाने लगे

कहानी लंबी है। आपको बहुत कुछ पता भी है। धीरे-धीरे न्यूज़ चैलन सस्ता मनोरंजन में तब्दील होने लगा। इंटरटेनमेंट संसार की सास-बहू दोपहर की खबरों में समाने लगीं। जो जितना बड़ा गप फेंक दे, उसकी कामयाबी उतनी बड़ी। पढ़े-लिखे संपादक घास छीलने लगे। मदारी संपादक मालिकों को भाने लगे। अब कितना लिखूं। अपने ही धंधे को कितना कोसूं। खुद भी वही सब किया हूं जिसकी खाल यहां उधेड़ रहा हूं। अब सवाल ये है कि आखिर आज ये सब क्यों लिख रहा हूं? पिछले हफ्ते किसी चैनल के एचआर विभाग ने कहीं से मेरा नंबर लेकर फोन किया था।

 ‘‘संजय जी, हमारे यहां नौकरी करेंगे?’’

 ‘‘जी। बताइए।’’ ‘‘

न्यूज का आपका प्रोफाइल तो ठीक है। पर आपको विज्ञापन दिलाने में मदद करनी होगी। पत्रकारीय हनक का इस्तेमाल करना होगा।’’ 

मेरे कान बंद हो रहे थे। प्रभाष जोशी याद आ रहे थे। मुङो नहीं लगता कि तब जनसत्ता में कभी किसी पत्रकार से विज्ञापन लाने की बात कही गई होगी। सर्कुलेशन बढ़ाने की बात कही गई होगी। अब बात ये है कि मैंने तो मना कर दिया। पर मेरे मना करने से क्या होता है? कोई न कोई तो आएगा ही, जनता को मूर्ख बनाएगा ही। जितने दिन काट पाएगा, काटेगा ही। 

यस सर, यस सर, थ्री बैग्स फुल।

 (आज बिना सिर पैर की कहानी सुनाने का मन था।)

 ** संजय सिन्हा 

कलमकार देश के जाने माने जर्नलिस्ट हैं

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