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‘दरारें ’ के मंचन में तलाशी गई मध्यमवर्गीय परिवारों के झगड़े की वजह

विवेचना के 27 वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह में दर्शक हुए मंत्रमुग्ध

जबलपुर। विवेचना के 27 वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह के तीसरे दिन दरारें नाटक ने एक अलग तेवर दिखाया। यहां मध्यमवर्गीय परिवारों में होने वाले झगड़े और उनके कारणों को तलाशा गया। नाटक ने दर्शकों को नाटक की बुनावट और आपसी अविश्वास की कहानी ने बहुत प्रभावित किया। ऐसा नाटक बहुत दिनों बाद देखने मिला जिसमें झगड़ों के बीच रहस्य की चादर भी फैली हुई दिखी। दरारें एक मध्यम वर्गीय परिवार की कहानी है जो पारिवारिक और सामाजिक संबंधों से गुजरती हुई एक ऐसी जगह पर आकर खड़ी हो जाती हैं क्योंकि यहां सभी के सामने एक दोराहा है। उसी दोराहे पर खड़े सही और गलत का चुनाव करना ही नाटक दरारें का सार है। एक सामान्य भारतीय परिवार किसी तरह जी रहा है। रोज रोज की तकरार के बीच एक रहस्यमयी नाटक शुरू हो जाता है जब घर में एक चोरी हो जाती है। परिवार के बाहर बहुत लोगों पर शक है परंतु क्या घर के अंदर भी कोई है जो इस चोरी में शामिल हो सकता है? 

मंच पर और मंच से परे अभिनय के सूत्रधार

 नाटक में विजय राजोरिया, मनीषा, गिंनी बब्बर, कपिल पाल, तनु सुनेजा, निशा उपाध्याय, जतिन शर्मा, अनूप गोसाई, सुधीर कुमार और सत्यम मंच पर थे। सभी ने विभिन्न पात्रों की भूमिका बहुत सधे तरीके से निभाई। नाटक का निर्देशन विकास बाहरी ने किया। लाइट वेशभूषा और साधारण मेकअप से नाटक बहुत प्रभावशाली बन पड़ा था। नाटक के अंत में कलाकारों का सम्मान किया गया। निर्देशक विकास बाहरी को अवधेश बाजपेयी की पेंटिंग भेंट की गई। विवेचना की ओर से हिमांशु राय, बांकेबिहारी ब्यौहार, मनु शरत तिवारी, अजय धाबर्डे, शुभम पांडेय, चिन्टू स्वामी, कार्तिक बैनर्जी, बलबहादुर ने कलाकारों को सम्मानित किया।

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