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पार्षद टिकट की जद्दोजहद में पैराशूटर्स से परेशान जमीनी कार्यकर्ता

भाजपा की सूची के लिए करना पड़ सकता है इंतजार 

 जबलपुर। नगरीय निकाय चुनाव में पार्षद टिकट की जद्दोजहद के बीच पैराशूटर्स यानी ऊपर से लादे गए चेहरे, और ग्राउंड रूटर्स यानी जमीन से जुड़े नेता-कार्यकर्ता बेचैन हैं। निकाय चुनाव में उतरने से पहले इन दोनों वर्गो के बीच संघर्ष का आलम है। 79 वार्डो की टिकटें फाइनल दौर में हैं। भाजपा की जिला कोर कमेटी से आए नामों पर संभागीय चयन समिति में मंथन के बाद तीन-तीन नामों के पैनल और अविवादित वार्डो में सिंगल नाम तय करने की कवायद चल रही है। सूत्रों के मुताबिक पार्टी की गाइड लाइन और निर्देशों के बावजूद कई वार्डो में पैराशूट प्रत्याशी पैनल में नाम जुड़वाने में सफल रहे हैं। ऐसे में जहां-जहां नेताओं की पसंद से चेहरे ऊपर से उतारे गए हैं, उनका विरोध पार्टी के ही अंदरखानों में हो रहा है। टिकट अभी कि सी पार्टी ने घोषित नहीं की हैं, लेकिन प्रत्याशियों को उनके आकाओं ने बता दिया है कि तुम्हारी पक्की है। ये पक्की शब्द ही दोनों तरफ बवाल क्रियेट कर रहा है। 

 दावेदारों का सवाल,तो क्यों करते हो बड़ी बातें

 ये डॉयलाग दोनों दलों के कार्यकर्ताओं में सेम है कि ‘जब प्रत्याशी थोपना ही है, तो बैठकों, पीसी में बड़ी-बड़ी बातें क्यों कीं जातीं हैं?’। नेता ये कह के अपना गिरेबां बचाने की कोशिश करते हैं कि टिकट का आधार ‘जीतने योग्य चेहरा’ है लेकिन कार्यकर्ता समझ रहे हैं कि इन तीन शब्दों को खेल की तरह अपना उल्लू सीधा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पैराशूर्ट्स के समर्थन में रणनीतिक बातें भी कहीं जा रहीं हैं। दोनों दलों के नेता कह रहे हैं कि साम-दाम, दंड-भेद हर स्तर से विरोधी दल को पटकना है, इस कारण कहीं-कहीं वैसे प्रत्याशी देने पड़ रहे हैं, लेकिन इस बात से दोनों पार्टी के भीतर पनप रहा असंतोष परिणाम बिगाड़ सकता है। दोनों पार्टी लंबे समय से दावा कर रही है कि पैराशूटर्स, पारिवारिक प्रत्याशी नहीं दिए जायेंगे, लेकिन हो वही रहा है। भाजपा में तय गाइड लाइन के बाद भी नेता अपनी पत्नी, बहू और बेटी के नाम पैनल में जुड़वाने में कामयाब रहे।

 असंतुष्टों पर आप, जदयू, शिवसेना, बसपा की नजर

 दोनों पार्टियों के असंतुष्टों पर अदर्स की नजर है। इनमें आप, जदयू, शिवसेना, बसपा सहित अन्य दल शामिल हैं। आप का तो इतिहास ही है कि दोनों तरफ के जीतने लायक असंतुष्ट चेहरों को अपनी तरफ मिला परिणाम बदल दो। मुस्लिम इलाकों की अलग रणनीति है। यहां के वोटबैंक को चूंकि एक पार्टी का विरोधी और एक का समर्थक माना जाता है, इस कारण यहां कैसे चुनाव जीतें, इसको लेकर अलग तरह की रणनीति बनाई जा रही है।

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