
भोपाल । मप्र की राजनीति में विंध्य क्षेत्र का अपना मुकाम है। कहा जाता है की प्रदेश में सत्ता की राह यही से निकलती है। यानी जिसने विंध्य फतह कर लिया उसकी सरकार बनती है। यही नहीं प्रदेश की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाला विंध्य हमेशा से थर्ड फ्रंट की मप्र में प्रवेश का द्वार रहा है। यूपी के सीमाई इलाके में बसे समाजवादियों के इस पुराने गढ़ में कालांतर में भाजपा-कांग्रेस जैसे दलों ने कब्जा तो किया लेकिन विंध्य ने बदलाव की रवायत को बदलने नहीं दिया। जब भी मौका मिला विंध्य ने सत्ताधारी दलों की मुस्कें कसीं और अपने जनादेश से विकल्प के खतरे की घंटी घनघना दी। कभी पृथक राज्य के रूप में पहचाने जाने वाले विंध्य ने प्रदेश की राजनीति में विकल्प बनने के लिए छटपटाने वाले दलों को हमेशा अपनी रत्न गर्भा वसुंधरा से राजनैतिक मार्ग दिया। हाल ही में सिंगरौली में आम आदमी पार्टी को नगर निगम चुनाव मिली जीत भी विंध्य की उसी उदारता नतीजा है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब किसी राजनैतिक विकल्प को मध्य प्रदेश में विंध्य के रास्ते प्रवेश मिला हो। इससे पहले वर्ष 1991 में कांशीराम की बसपा को भी विंध्य ने ही मप्र में प्रवेश का रास्ता दिया और दिखाया था। वर्ष 1991 के लोकसभा चुनाव में भीम सिंह मप्र से बसपा के पहले सांसद चुने गए थे। बुद्धसेन पटेल और देवराज पटेल भी लोकसभा में पहुंचे। रीवा में कामयाबी के बाद बसपा ने सामाजिक बदलाव के नारे के साथ प्रदेश की राजनीति में दलित वोटों का ध्रुवीकरण इस कदर तेज कर दिया कि भाजपा-कांग्रेस जैसे दलों को इस जाति वर्ग को केंद्र में रख कर अपनी राजनैतिक नीतियां बनानी पड़ीं, चुनाव लडऩे पड़े और सरकारों को योजनाएं बनानी पड़ीं। विंध्य ने बसपा के बाद सपा को भी शक्ति दी। यूपी से जब मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी आगे बढ़ी तो सोशलिस्टों के गढ़ विंध्य ने सीधी के गोपद बनास से कृष्णकुमार सिंह भंवर, देवसर से वंशमणि वर्मा और सतना के मैहर से नारायण त्रिपाठी को विधानसभा भेज कर मप्र में उसकी भी स्थापना में भूमिका निभाई। हालांकि सपा यहां जड़ें नहीं जमा पाई, जबकि मैहर के विधायक नारायण सपा के प्रदेशाध्यक्ष भी बनाए गए।
