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नेताजी का अंतिम आदेश टाइप किया था पंडित करतार चंद शर्मा ने

23 जनवरी आजादी के महानायक सुभाष चंद बोस की जयंती पर विशेष 

 नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 16 अगस्त 1945 को सिंगापुर से अपनी अंतिम हवाई यात्ना की थी । आजाद हिन्द फौज मुख्यालय सिंगापुर से रवाना होने के पूर्व उनके द्वारा अंतिम आदेश अगले हुक्म तक मेजर जनरल मोहम्मद जमाल क्यानी रियर हेड क्वार्टर सुप्रीम कमांड सिंगापुर के ऑफिसर इंचार्ज होंगे, पारित किया था । जिसे आजाद हिंद फौज के एडज्युटेंट ( दण्डपाल ) स्व.पंडित करतारचंद शर्मा जी द्वारा टाइप कर आजाद हिंद फौज की समस्त इकाइयों को प्रेषित किया था , जिससे फौज को यह ज्ञात हो सके कि नेताजी सिंगापुर में नहीं हैं । हवाई जहाज से उसी दिन नेताजी अपने सहयोगी कर्नल हबीबुर रहमान के साथ सिंगापुर से रवाना हुये थे ।फार्मूसा ( वर्तमान नाम ताइवान ) के ताहूहाकू हवाई अड्डे पर नेताजी के हवाई जहाज में तथाकथित आग लग गई जिसमे उनकी शहादत होना बताया गया।

 अंतिम समय ओमती के पुलिस क्वार्टर में

स्वतंत्नता संग्राम सेनानी पंडित करतारचंद शर्मा जी आजाद हिंद फौज के एडज्युटेंट( दण्डपाल ), द्वितीय विश्व युद्ध के योद्धा एवम नेताजी के अभिन्न सहयोगी थे। वे मूलत: होशियारपुर,पंजाब के निवासी थे,हमेशा कहते थे कि हमने आजादी सिर्फ बातचीत से नहीं बल्कि ब्रिटिश शासन को अपने खून और पसीने से ललकार कर हासिल की है । नेताजी के जाने व आजादी के उपरांत रेलवे में नौकरी करते वे खण्डवा ( म.प्र.) के स्थायी निवासी हो गये । उन्होंने अपने जीवन के उत्तरार्ध का अधिकांश समय अपने पुत्न नरेश शर्मा , सेवानिवृत्त उप पुलिस अधीक्षक के साथ जबलपुर के ओमती स्थित पुलिस क्वार्टर में व्यतीत किया था ।

 स्व शर्मा के अंग्रेजी में लिखे संस्मरण का अनुवाद ..... 

1- सुभाष चंद्र बोस को अंग्रेज अपना सर्वाधिक घातक एवं खतरनाक शत्नु मानते थे । 2- दिनाँक 10-12-21 से 02-07-1940 के बीच अंग्रेजों ने नेताजी को 11 बार गिरफ्तार किया था । इस गिरफ्तारी में नेताजी को मध्य प्रदेश के सिवनी एवं जबलपुर जेलों में भी निरु द्ध रखा गया था । 3- सिंगापुर के एस्प्लनाड पार्क में 30 अक्टूबर 1943 को सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज के सर्वोच्च सेनापति के रूप में भारत की वैकिल्पक सरकार बनाई थी व उसे आरजी हुकूमत-ए-हिन्द अर्थात आजाद हिंद सरकार नाम दिया था । इस सरकार में सुभाष चंद बोस को प्रधानमंत्नी, युद्ध मंत्नी( रक्षा मंत्नी),विदेश मंत्नी बनाया गया था । 4- नेता जी द्वारा उसी दिन तिरंगा फहराकर वहाँ अपने मुख्यालय कैपाले भवन की स्थापना भी की थी तब नेताजी को मुख्यालय में प्रथम फौजी सलामी दी गई थी 5 - नेता जी द्वारा अंडमान को शहीद द्वीप निकोबार को स्वराजदीप नाम दिया था। अभिवादन हेतु जय हिंद , सुभाष जी हेतु नेताजी संबोधन , राष्ट्रगीत जन गण मन राष्ट्रीय भाषा हिंदुस्तानी होने का निर्णय भी लिया गया था । 6- नेता जी द्वारा ली गई शपथ एवम उक्त लिये गये निर्णय को भी आजाद हिंद फौज के दंडपाल पंडित करतारचन्द शर्मा जी द्वारा ही टाइप किया गया था । 7- नेता जी द्वारा शासन प्रमुख के रूप में ली गई शपथ इस प्रकार थी भारत को स्वाधीन कराने व अपने 48 करोड़ देशवासियों को आजादी दिलाने के लिये मैं अपने जीवन की अंतिम साँस तक युद्ध लड़ता रहूँगा। 8- दिनाँक 24 अक्टूबर 1943 को नेताजी ने तुम मुङो खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा का नारा दिया व ब्रिटेन व अमेरिका के विरु द्ध युद्ध की घोषणा कर दी । 9 - 1943 में ही टोक्यो जापान में नेताजी को आजाद हिंद सरकार के राष्ट्राध्यक्ष के रूप में मान्यता देकर सम्मानित किया गया । 10- दिनांक 04-06-1944 को राष्ट्र के नाम प्रसारण में नेताजी ने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता संबोधित कर आजादी की लड़ाई में विजय हेतु उनका आशीर्वाद माँगा था । 11 - नेता जी ने सिंगापुर में विश्व युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों की याद में 8 जुलाई 1945 को स्मारक बनाया था । जिसे 1945 में ही ब्रिटिश सेना द्वारा तोड़ दिया गया था । युद्ध की 50 वीं वर्षगांठ पर अर्थात 1995 में इस स्मारक को पुन: विकिसत किया गया है । स्मारक में आजाद हिंद फौज के सूत्न वाक्य एतिहाद ( यूनिटी अर्थात एकता ) , एत्माद ( फेथ अर्थात विश्वास ) एवम कुर्बानी ( सैक्रि फाइस अर्थात बलिदान ) लिखे हुये हैं । सिंगापुर में बना यह स्मारक व वहाँ बना पार्क इसलिये विशेष है कि यहाँ आजाद हिंद फौज की स्थापना हुई थी व फौज की गतिविधियां यहीं पर संचालित होती थी । 12- द्वितीय विश्व युद्ध में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व मे आजाद हिन्द फौज में भी पंडित करतारचन्द शर्मा सिम्मलित थे । 13- नेताजी का जबलपुर से अत्यंत गहरा संबंध रहा है वे अपने जीवन काल में तीन बार जबलपुर आये थे । पहली बार तब,जब उन्हें 30 मार्च 1932 को सिवनी जेल से जबलपुर जेल स्थानांतरित किया गया , दूसरी बार 18-02-1933 को वे बीमार अवस्था में जबलपुर आये थे एवम तीसरी बार 1939 में काँग्रेस के 52 वें सम्मेलन त्रिपुरी अधिवेशन में भाग लेने । उस समय उन्हें 104 डिग्री बुखार था । 14- त्रिपुरी अधिवेशन में नेताजी ने महात्मा गाँधी समिर्थत प्रत्याशी पट्टाभि सीतारमैय्या को 203 मतों से पराजित किया था । तब गाँधी जी ने कहा था पट्टाभि सीतारमैय्या की पराजय मेरी पराजय है । 15- नेताजी की इस विजय के सम्मान में जबलपुर के 52 वें अधिवेशन के संकेत स्वरूप 52 हाथियों से सजे रथ में शोभा यात्ना निकाली गई थी । बीमारी के कारण नेताजी इस शोभायात्ना में सम्मिलित नहीं हुए किंतु उनकी रथ में रखी फोटो के दर्शनार्थ ही जनसैलाब उमड़ पड़ा था। स्वर्गीय पंडित करतार चंद जी शर्मा ने जीवन पर्यंत नेताजी की विमान दुर्घटना में हुई मृत्यु की घटना को स्वीकार नहीं किया और वे सदैव नेताजी की वापसी की प्रतीक्षा करते रहे व 19 जनवरी 2001 को जबलपुर में स्वर्ग सिधार गये । पंडित करतारचन्द शर्मा जी का कृतज्ञ परिवार आज भी नेता जी के जन्मिदवस 23 जनवरी को सबसे बड़े त्यौहार महा उत्सव के रूप में गर्व व सम्मान से आत्मविभोर होकर मनाता है ।

 ** जय हिन्द

 नरेश शर्मा , रा.पु.से. उप पुलिस अधीक्षक (से.नि.)

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