आलाकमान को थी भनक, इसलिए प्रियंका ने नहीं दी कोई जिम्मेदारी
नई दिल्ली। यूपी पूर्वाचल के कद्दावर नेता आरपीएन सिंह ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा ज्वाइन कर ली और पीएम नरेंद्र मोदी को राष्ट्र के नवनिर्माण का महानायक बताकर भाजपा में शामिल होने के कसीदे पढ़ दिए। उन्होने यह तक कह दिया कि जिस पार्टी में वे 30 साल पहले आए थे वह अब खत्म हो गई और उसकी सोच भी वैसी नहीं रही। उधर, कांग्रेस ने विचारधारा की लड़ाई में आरपीएन सिंह को कायर करार देकर ये भी संकेत दे दिया कि सिंह की कांग्रेस को कमजोर करने की साजिश का पता आलाकमान को लग गया था। दलबदल को लेकर मची होड़ में चौंकाने वाली खबर है कि झारखंड सरकार गिराने की डील में आरपीएन सिंह की भूमिका की भनक भी कांग्रेस को मिल गई थी।
भाजपा ज्वाइन करने की स्क्रिप्ट दो माह पुरानी
आरपीएन सिंह की भाजपा में शामिल होने की स्क्रिप्ट करीब 2 महीने पहले ही लिखी जा चुकी थी। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक आरपीएन झारखंड के कांग्रेस प्रभारी बनाए जाने के बाद से भाजपा के संपर्क में रहे। आरपीएन के प्रयास से ही 2019 में हुए झारखंड विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, झामुमो और राजद के बीच चुनावी गठबंधन बना था। इसके बाद लगातार कांग्रेस आलाकमान को सूचना मिलती रही कि आरपीएन सिंह अंदरूनी तौर पर भाजपा के लिए कार्य कर रहे हैं और उन्होने कुछ समय पहले झारखंड सरकार गिराने का प्रयास भी किया था। इसके बाद वे सही वक्त का इंतजार कर रहे थे और जैसे ही पूर्वाचल के दूसरे बड़े पिछड़ों के नेता स्वामी प्रसाद मौर्या ने भाजपा छोड़ी, आरपीएन की भाजपा ज्वाइनिंग की पटकथा लिख दी गई।
झारखंड सरकार गिराने की साजिश में पत्रकार भी शामिल
पिछले साल जुलाई में झारखंड सरकार को गिराने की साजिश हुई थी। इसमें शामिल कुछ लोगो को गिरफ्तार भी किया गया था। जुलाई 2021 में गिरफ्तार आरोपियों ने पुलिस पूछताछ में बताया था कि साजिश में झारखंड के तीन विधायक, दो पत्रकार व बिचौलिए शामिल थे। दिल्ली में तीनों विधायकों से लेनदेन की डील भी हुई थी। एक करोड़ एडवांस का वादा भी किया गया था, लेकिन रकम नहीं देने पर विधायक रांची लौट गए थे। सरकार गिराने की साजिश में महाराष्ट्र के दो नेता चंद्रशेखर राव बावनकुले और चरण सिंह के शामिल होने की खबर थी। स्थानीय नेताओं की शिकायत के बाद आरपीएन सिंह
शक के दायरे में आ गए और उनको महत्व कम मिलने लगा। यही वजह है कि यूपी चुनाव की कमान संभालने वाली प्रियंका गांधी वाड्रा ने अपनी टीम और यूपी चुनाव अभियान में भी आरपीएन को कोई जिम्मेदारी नहीं दी।