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किलकारियां शांत हो गईं, सिसकियां हाल बयां कर रही हैं...

हमीदिया के कमला नेहरू अस्पताल में सोमवार को बच्चों के क्रिटिकल केयर यूनिट में लगी आग ने कई नवजातों की जान ले ली। जिनकी किलकारियों से कई घरों की दुनिया को गूंजना था, वह हमेशा-हमेशा के लिए उस अस्पताल में शांत हो गईं जहां जिंदगी की सौगात मांगने गईं थीं। बेबस, लाचार और लुटे हुए परिजनों की सिसकियां प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में हो रही लापरवाही का पूरा हाल बयां कर रहीं हैं। सरकार ने शाजमा, इरफाना, शिवानी और रचना के लहूलुहान जिगर का हाल तो देख ही लिया होगा, लेकिन जिंदगी गवां चुके उन जिगर के टुकडों की मजबूर मांओं के नाम भी जल्दी ही सामने आ जाएंगे जिनका कबूलनामा देर से ही सही लेकिन सरकार को करना ही होगा। प्रदेश की साढे़ सात या सवा आठ करोड़ यानि पूरी आबादी का मन व्यथित है और आत्मा भी व्यथित है क्योंकि घटना ह्रदय विदारक है, लेकिन यह पहली बार नहीं है और शायद आखिरी बार भी नहीं है। ठीक उसी तरह जैसे कि यह राजनीति का विषय नहीं है, लेकिन फिर भी राजनीति हो रही है। कोई बच्चों की जान बचाने को उपलब्धि बताकर राजनीति कर रहा है बजाय इसके कि जान गंवाने वाले बच्चों को अपनी विफलता स्वीकार कर सच्ची श्रद्धांजलि देने और ऐसी किसी घटना का दोहराव न होने देने का संकल्प लेने और भरोसा दिलाकर। तो कोई नवजातों की मौत पर सरकार को निर्वस्त्र करने के लिए सभी आरोपों को चस्पा कर विपक्ष के धर्म का ईमानदारी से पालन कर अपनी श्रेष्ठता साबित कर रहा है, वह भी यह कहते हुए कि यह राजनीति का विषय नहीं है... मंत्री का इस्तीफा मांगकर और व्यवस्थाओं पर प्रहार कर राजनीति का तड़का पूरे जोर-शोर से लगाया जा रहा है। जैसे कि मंत्री इस पल इस्तीफा दें और स्वास्थ्य सेवाओं का दूसरे पल ही कायाकल्प हो जाए। स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली बस इसी क्षण का इंतजार कर रही हो। राजनीति का पहिया अपनी धुरी पर समान गति से घूम रहा है। न इस पाले में थमा है और न उस पाले में थमा है। न पहले किसी पल थमा था, न भविष्य में किसी पल थमेगा। घटनाएं पहले भी होती रहीं हैं ह्रदय विदारक और बाद में भी होती रहेंगीं। राजधर्म का पालन होगा। सरकार जांच कराएगी और विपक्ष और अच्छी जांच की मांग करेगा। सिलसिला यूं ही चलता रहेगा। असली गुनहगार कौन है और सजा किसको मिलेगी, इस पर बात कर व्यर्थ में समय बर्बाद करने की जेहमत मत उठाएं तो बेहतर है। पर मुझे याद आ रहा है कि कहा गया था कि जिलों में गड़बड़ हुई तो कमिश्नर, कलेक्टर, आईजी और एसपी भी नहीं बचेंगे। और कई पर गाज गिरी भी थी। पर क्या जिम्मेदारी यही तक सीमित होकर पूर्णता को पा लेगी? सवाल बड़ा बोझिल है जिम्मेदारों के लिए भी और गैर जिम्मेदारों के लिए भी। हमारी याददाश्त बहुत कमजोर हो चली है। चार दिन बाद हम सब भुलाकर फिर नई ह्रदय विदारक घटना का इंतजार करते नजर आएंगे। अब बताओ कितने लोगों को उस भयावहतम ह्रदय विदारक घटना की याद है जो सीधी बस हादसे के रूप में दर्ज है। नहर किनारे के उस चीत्कार और लाशों के ढेर देखकर शायद हत्यारों की आंखें भी नम हो गई होगीं, आम आदमी ने तो मातम मनाया ही होगा। पर अब किसे पता है कि उसकी रिपोर्ट क्या आई थी, सरकार ने क्या चाक-चौबंद व्यवस्थाएं कर ली हैं और क्या प्रदेश के सभी जिलों में परिवहन व्यवस्था पूरी तरह से खामियों से मुक्त हो गई है? सरकार-विपक्ष और प्रदेश की आबादी सभी स्थितियों से भली भांति वाकिफ हैं। चार दिन बाद इस घटना का भी वही हश्र होने वाला है। सिसकियां उन चारदीवारों में सिमट जाएंगीं और उन जिगरों में लौ की तरह भभकती रहेंगीं, जिनके टुकड़े स्वास्थ्य महकमे के लापरवाह कारिंदों की करतूतों के चलते जीने से पहले ही मौत को गले लगाकर दुनिया को अलविदा कह गए। बाकी घरों में हर दिन की तरह अपने-अपने जज्बातों के साथ जिंदगी टिमटिमाती रहेगी। 1970 में रिलीज हुई "सफर" फिल्म का एक गाना जुबां पर आ रहा है। जिसे "इंदीवर यानि श्यामलाल बाबू राय" ने लिखा था, संगीतकार "आनंद जी वीरजी शाह, कल्याण जी वीरजी शाह" ने संगीतबद्ध किया था। मशहूर गायक "किशोर कुमार" ने आवाज दी थी। सुपर स्टार "राजेश खन्ना" पर फिल्माया गया था। इस गाने का यह स्टैंजा पूरी तरह से इन मासूमों की कहानी बयां कर रहा है। "ऐसे जीवन भी हैं जो जिए ही नहीं जिनको जीने से पहले ही मौत आ गयी फूल ऐसे भी हैं जो खिले ही नहीं जिनको खिलने से पहले फ़िज़ा खा गई है परेशान नज़र थक गए चारागर कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं ज़िन्दगी का सफ़र है ये कैसा सफर कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं." आज हम बिल्कुल राजनीति नहीं करेंगे, न ही किसी राजनेता का नाम लिखेंगे। लेकिन यह जरूर स्वीकार करेंगे कि जब तक समाज का प्रत्येक व्यक्ति देश के सच्चे नागरिक के रूप में जागरूक होकर व्यवस्थाओं के सुधरने तक चैन की सांस न लेने का संकल्प नहीं लेगा, तब तक न व्यवस्थाएं सुधरेंगीं, न देश का नवनिर्माण होगा। तब तक मासूमों और बुजुर्गों, युवाओं और अधेड़ों, पुरुषों और महिलाओं, अमीरों और गरीबों सभी को अव्यवस्थाओं का शिकार होने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। फर्क सिर्फ इतना रहेगा कि आज कोई रोएगा, कल कोई रोएगा, पर एक न एक दिन अव्यवस्थाओं का शिकार होकर सभी को रोना ही पड़ेगा। बहुत सारी जिंदगियां जीने की हसरत लिए अव्यवस्थाओं का शिकार होकर काल के गाल में समाती रहेंगीं, किसी के दिल में दर्द का सैलाब उठेगा तो कुछ लोगों की आंखें नम होंगी, बाकी लोग अपनी-अपनी बारी का खुशी-खुशी इंतजार करते रहेंगे। आज इरफाना, शाजमा, शिवानी, रचना और अन्य की बारी थी, तो कल किसी और की होगी। किलकारियां शांत होंगीं और सिसकियां हाल बयां करती रहेंगीं। * कलमकार कौशल किशोर चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं
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