मुझे एक किस्सा याद आ रहा है। उमा भारती प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं। राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव थे। एक उपचुनाव और दूसरा चुनाव। उपचुनाव वाली सीट पर लक्ष्मीनारायण शर्मा का नाम तय हुआ और पूर्णकाल वाली सीट पर नारायण सिंह केसरी का। नामांकन भरा गया तो पूर्ण वाली पर लक्ष्मीनारायण शर्मा का और उपचुनाव वाली पर केसरी का। तब हायकमान ने आपत्ती ली। पार्टी अध्यक्ष वैंकैया नायड़ु ने उमा जी को फोन लगाया और कहा कि हायकमान के निर्णय को कैसे बदल दिया गया? उमा का जवाब था कि आप अपने राज्य (आन्ध्र) में छह सीट जितवाने के बाद हायकमान हो और मैंने मेरे राज्य में 174 सीट जितवाई हैं तो मैं क्या हुई? जो तय हो गया वही सही है। हायकमान मन मसोस की रह गया। आज फिर से हायकमान का प्रतिनिधि प्रदेश के सामने अपने बयानों के कारण चर्चित हो रहा है। प्रदेश प्रभारी मुरलीधर राव (murlidhar rao) वास्तव में संघ के प्रचारक हैं। वहां से नेता बनाने के लिए भेजा गया है। स्वदेशी जागरण मंच में काम करते थे लेकिन विदेशी सामान के शौकीन हैं। अब भाजपा में आ गये तो बड़ी जिम्मेदारी मिल गई। राजनीतिक अनुभव नहीं है तो कुछ भी बोल दे रहे हैं। संघ के कार्यालय में जो बोला जा सकता है वह राजनीति के मैदान में नहीं बोला जाता। यह शायद उनको पता नहीं है? पहले का विवाद पार्टी का आन्तरिक मामला था। बोल गये कि पांच-छह बार के विधायक सांसद टिकिट मांगते हैं कितने नालायक हैं। उमा की बात यहां फिट होती है। अपने राज्य में सीट जितवाने में पसीने आते हैं और बीस साल सरकार वाले राज्य में ज्ञान परोस रहे हैं। क्या अनुभव है कि पांच बार का विधायक कितने नेता तैयार कर चुका है? लेकिन पार्टी की बात थी तो गले नहीं पड़ी। हौसला बढ़ता गया। पत्रकारों के सामने ही बोल गये कि ब्राह्मण ऊपर वाली जेब में और बनिये नीचे वाली जेब में हैं। गलतफहमी में हैं। राजनीति जेब में रखने से नहीं दिल में रखने से चलती है। शिवराज यूं ही मुख्यमंत्री नहीं बने। जनता को भगवान की तरह मानते हैं इसलिए वह उन्हें चुनती है। जेब में रखने का दंभ नहीं भरते। नरेन्द्र मोदी हरदिल अजीज क्यों हैं? क्योंकि उन्होंने वह किया है जिसके लोग दीवाने हैं। झुक कर प्रमाण करते हैं मंचों से दस साल का प्रधानमंत्री तो जमाने को जेब में रखने की बात कर सकता है। कौन रोकेगा? लेकिन विन्रमता वह फल है जिसकी मिठास कभी कम नहीं होती। हेकड़ी कडवी होती है। वह दूसरों के मूंह की तासीर बिगाड़ती है तब सत्ता का स्वाद बिगड़ जाता है। मुरलीधर को कौन सा फर्क पड़ेगा? जिस राज्य से आते हैं वहां सत्ता की संभावना दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती इसलिए उन्हें तकलीफ कैसी और मजा कैसा? यहां आकर तरावट से जुबान फिसल रही है। अब दो दिन हो गये भाजपा के कुछ नेताओं ने सवाल किया है कि आप ही बताओ भाई साहब यह मुरली धर राव भाजपा के लिए एसिस्ट है या फिर लायबिलिटी? हम क्या उत्तर दें। कार्यकर्ताओं से कह रहे हैं कि सत्ता से ऊबों मत और पत्रकारों के सामने बामन बनियों को जेब में पड़ा बता रहे हैं। कार्यकर्ताओं से बोले पहले गणेश को मनाना होगा एक ने वहीं पूछ लिया प्रसाद मिलेगा क्या? इन दिनों भाजपा इसी जद्दोजहद में फंसी है और राव उसे उलझा रहे है।
* क़लमकार सुरेश शर्मा भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार हैं